एक तरही गजल -
हरेक सिम्त शजर के सिवा कुछ और नहींमेरी तलब है ख़िज़र के सिवा कुछ और नहीं नजर की ज़द में लहर के सिवा कुछ और नहींमगर तलाश गुहर के सिवा कुछ और नहींहरेक रोज की उलझन है और दुश्वारीहयात जैसे बहर के सिवा कुछ और नहींजला के बस्तियां संसद में चींखता है वो
हमें तो फिक्र-ए-बशर के सिवा कुछ और नहीं हरा-भरा है मगर ये शजर कटेगा जरूरसभी को शौक़-ए-समर के सिवा कुछ और नहींतुम्हारे पास 'पहुंच' भी है और 'पैसा' भीहमारे पास हुनर के सिवा कुछ और नहींकिया जो इश्क तो ये राज भी खुला हम पर 'हयात सोज़-ए-जिगर...
29.6.14
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