11.9.12


भारतीय टीम जब 18 सितंबर से टी-20 विश्व के अभियान की शुरूआत करेगी तो टीम को सबसे ज्यादा कमी एक ऑलराउंडर की खलेगी। क्रिकेट के इस छोटे संस्करण में ऑलराउंडर की भूमिका अहम हो जाती है। विश्व कप में हिस्सा ले रही ज्यादातर टीमों के पास बेहतरीन ऑलराउंडर है। पर भारत के पास ऑलराउंडर के नाम पर सिर्फ इरफान पठान है। पठान भी गेंदबाज ज्यादा और बल्लेबाज कम हैं। यह भारत की विफलता रही है कि कपिल देव के बाद सही मायने में कोई ऑलराउंडर भारत नहीं ढूंढ पाया।
2007 में जब हम खिताब जीते थे तब भी स्थिति यही थी। पांच साल बाद आज भी कुछ नहीं बदला। भारतीय बोर्ड ने आईपीएल को यह कह कर प्रोत्साहित कया कि इससे घरेलू प्रतिभाएं निकलेंगी। आश्चर्य है, आईपीएल के पांच संस्करण भी हमें एक अदद ऑलराउंडर नहीं दे पाया। ध्यान रहे पठान आईपीएल की देन नहीं हैं।  2007 विश्व कप के भारतीय टीम की तुलना अगर इस विश्व कप के टीम से की जाए तो इस बार 6 नए चेहरे है। इन 6 में से 4 खिलाड़ी ही ऐसे है जो 2007 के बाद प्रकाश में आए। सुरेश रैना, आर अश्विन, अशोक डिंडा और विराट कोहली। यानी पिछले 5 साल में हमें टी-20 के लिए उपयोगी सिर्फ 4 खिलाड़ी ही मिले है। उसमें भी कोई ऑलराउंडर नहीं। उम्मीद है, विश्व कप में ऑलराउंडर की कमी को रैना, सहवाग और रोहित शर्मा पूरी करेंगे।
टी-20 विश्व कप के चार ग्रुप में से प्रत्येक ग्रुप में एक कमजोर कड़ी है। ग्रुप ‘ए’ में भारत के साथ अफगानिस्तान है, तो ग्रुप ‘बी’ में आयरलैंड। वहीं ग्रुप सी और डी में क्रमश: जिम्बाब्वे और बांग्लादेश की टीम है (इसे कमजोर समझना बेमानी होगी)।  इतना तो तय है कि अफगानिस्तान, आयरलैंड और जिम्बाब्वे के लिए कप तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है। मैं बंग्लादेश को इस श्रेणी में नहीं रखना चाहता, क्योंकि एशिया कप के फाइनल में पहुंचकर और फाइनल करीब-करीब जीतकर वह मुख्य धारा की टीम बन गई है। तो फिर आयरलैंड, अफगानिस्तान और जिम्बाब्वे का मकसद क्या होगा? जाहिर है, बड़ी टीमों को चौंकाना। उलटफेर करना। टी-20 विश्व कप के इतिहास में उलटफेर होते रहे हैं। 2007 में हुए पहले टी-20 विश्व कप में बांग्लादेश (तब अमूमन कमजोर टीम हुआ करती थी) ने वेस्टइंडीज को 6 विकेट से हराकर टूर्नामेंट से ही बाहर कर दिया था। यह तो फिर भी स्वीकार्य था। लेकिन ग्रुप बी के एक मैच ने सबका ध्यान खींचा। जिम्बाब्वे जैसी कमजोर टीम ने कंगारूओं को धर दबोचा। वो तो भला हो कि जिम्बाब्वे का नेट रन रेट थोड़ा कम पड़ गया, अन्यथा आस्ट्रेलिया का पत्ता साफ हो जाता। टी-20 विश्व कप के दूसरे संस्करण में भी उलटफेर हुए। आयरलैंड ने बांग्लादेश को न सिर्फ हराया बल्कि उसे प्रतियोगिता से भी बाहर कर दिया। पर इस संस्करण का असली उलटफेर अभी बाकी था। हॉलैंड ने अपने चिर प्रतिद्वंद्वी इंग्लैंड को 4 विकेट से हराकर सनसनी मचा दी। हॉलांकि बेहतर रन रेट से इंग्लैंड नॉकआउट तक पहुंचने में कामयाब रहा। हॉलैंड की टीम इस बार विश्व कप के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई।
सिर्फ टी-20 में ही नहीं, एकदिवसीय में भी ऐसी टीमें उलटफेर करने में माहिर रहीं है। 2007 विश्व कप में बांग्लादेश ने भारत को हरा कर बाहर कर दिया था। यही हश्र आयरलैंड के हाथों हार कर पाकिस्तान का हुआ। 2011 विश्व कप में भी आयरलैंड ने इंग्लैंड को हराया था। यह जीत इस लिए बड़ी थी क्योंकि आयरलैंड ने 329 रन का लक्ष्य हासिल किया था। उलटफेर के इस सिलसिले का इस विश्वकप में भी जारी रहने की संभावना है। क्योंकि कमजोर टीमों का मूल मंतव्य बड़े टीमों का शिकार कर उनका समीकरण बिगाड़ने का होता है।

मोहम्मद शकील, भोपाल
‘‘इतिहास के अच्छे प्रदर्शन मायने नहीं रखते। ऐतिहासिक गौरव सिर्फ प्रेरणा दे सकता है। सच्चई तो यह है कि किसी खिलाड़ी के लिए एक दिन खास होता है, जिस दिन वह परफार्म करता है।’’
यह कहना है राजधानी भोपाल के एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय और विश्व के नंबर तीन स्नूकर खिलाड़ी कमल चावला का, जो 24 नवंबर से आईबीएसएफ विश्व स्नूकर चैंपियनशिप में उतरेंगे। इसके लिए उन्हें भारत से प्रथम वरीयता दी गई है। यह चैंपियनशिप बुल्गारिया के शहर सोफिया में खेली जाएगी। प्रदेश टुडे से खास बातचीत में कमल ने कहा कि मैं इस टूर्नामेंट में पिछली बार सेमीफाइनल तक पहुंचा था। पर इससे इस टूर्नामेंट में कोई असर नहीं पड़ेगा। खिलाड़ी के लिए हर दिन नया होता है और एक दिन खास होता है जिस दिन वह परफार्म करता है।
विश्व स्नूकर चैंपियनशिप की मेजबानी पहले मिस्र को करनी थी। पर सुरक्षा कारणों से मिस्र ने मेजबानी से इंकार कर दिया। कमल ने बताया कि मैं यह सोच कर परेशान था कि कहीं यह चैंपियनशिप रद्द न हो जाए। क्योंकि ऐन मौके पर कोई भी देश इतने बड़े आयोजन की जिम्मेदारी लेने से कतराएगा। चूंकि अब यह चैंपियनशिप बुल्गारिया में होना तय है तो अब मेरा पूरा ध्यान चैंपियनशिप पर केंद्रित है।
आगे कमल ने कहा कि मैं 15 अक्टूबर के आसपास ट्रेनिंग के लिए जाने की सोच रहा हूं।  उन्होंने बताया कि कल खेल संचालक डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव से उनकी बात हुई थी और उन्होंने अच्छी ट्रेनिंग दिलाने का आश्वासन दिया है। उल्लेखनीय है कि खेल एवं युवा कल्याण विभाग ने पिछले वर्ष शेफील्ड में एक महीने की ट्रेंनिग पर भेजा था, जिससे उनके प्रदर्शन में सुधार भी हुआ था। मालूम हो कि चैंपियनशिप में कमल चावला के अलावा ब्रजेश दमानी भी हिस्सा लेंगे।
पहले यह चैंपियनशिप मिस्र में होने वाली थी, लेकिन इसे बदलकर अब बुल्गारिया में कर दिया गया है। कमल गत वर्ष भारत में खेली गई विश्व चैंपियनिशप में सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था और तीसरा स्थान हासिल किया था। इस बार कमल विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने से पहले एक महीने की ट्रेनिंग के लिए विदेश जाना चाहते हैं।




24.2.12

बुधवार को बीएचएमएस थर्ड ईयर की छात्रा ने अपने कमरे में फांसी लगा ली. वजह था प्यार में धोखा. इससे पहले भी मेडिकल की एक छात्र ने ख़ुदकुशी कर ली थी. वहां भी मामला प्रेम प्रसंग का ही था. ऐसी ख़बरें कितनी दुखद होती है. सिर्फ मनचाहा प्यार न मिलने पर जिंदगी को अलविदा कह देना, युवाओं की सोच पर बड़े सवाल खड़े करता है. आखिर युवाओं में इतनी हताशा, इतनी निराशा क्योँ?
कुछ ही दिन पहले की बात है. मेरे कॉलेज में दो दोस्त आपस में झगड़ रहे थे. एक का कहना था कि तुमने बीती रात मेरा फ़ोन सिर्फ इस लिए नहीं उठाया, क्यूंकि तुम उस वक़्त किसी लड़की से बात कर रहे थे. तुम लड़कियों को बिला वजह इतना महत्व देते हो. मैं तो लड़कियों को घुटने पर रखता हूँ. तभी दूसरा दोस्त अपने जूतों कि तरफ इशारा करते हुए बोला- मैं लड़कियों को यहाँ रखता हूँ...............................
यह विचार किसी एक लड़के के व्यतिगत हो सकते हैं, पर इसमें कोई शक नहीं कि लडको कि ऐसी मानसिकता लड़कों के एक बड़े समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं. ज़ाहिर है अगर लड़के लड़कियों के बारे में ऐसी सोच रख सकते हैं, तो उसे मरने के लिए भी छोड़ सकते हैं. मेरा भी व्यकिगत तौर पर भी यही मानना है कि लड़के अच्छे प्यार करने वाले होते हैं, जबकि लड़कियां अच्छी चयन करने वाली होती है. अंग्रेजी में कहा भी जाता है- "Boy is a good lover and girl is a good chooser". बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं, जब लडकियां किसी से सच्चा प्यार करती है. पर जब वो सच्चा प्यार करती है, तो पूरे मन से करती है. यहाँ तक कि नर्क तक भी उस लड़के का पीछा करती है. मुझे कहने में कोई झिझक नहीं कि उनके  प्यार की पराकाष्ठा ही उन्हें आत्महत्या पर आमादा कर देती है.
मैं लड़कों को कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहूँगा. पर वे इन बारीकियों को समझें  कि सच्चा प्यार करने वाली लड़कियां किसी भी कीमत पर हार नहीं मानतीं. तब उनके पास दो ही रास्ते होते हैं. या तो आपने प्यार को पाना या फिर खुद को मिटा देना.
लड़कियों को भी यह समझने होगा कि ख़ुदकुशी कोई समाधान नहीं है. मरने के बाद अगर किसी को प्यार का एहसास हो भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है. बेहतर तो यही होगा कि लड़कियां जीते जी अपनी भावनाओं को समझा पायें. वैसे भी समय से पहले और तकदीर से ज्यादा किसी को क्या मिलता है. नियति भी कोई चीज़ होती है......
सदा तो धूप के हाथों में भी परचम नहीं होता
ख़ुशी के घर में भी बोलो क्या कोई गम नहीं होता?
फ़क़त एक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वाले
फ़क़त उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता


उम्मीद है अब ऐसी ख़बरें हमारे कान के पर्दे से नहीं टकराएंगी.

15.7.11

13.7.11

नंदनी को जब अरमान ने किसी दूसरे लड़के  के साथ बाईक पर घूमते देखा तो उसका मन निराशा से भर गया। उन्हें वह दौर याद आ गया जब नंदनी उनके साथ हाथों में हाथ डालकर घूमा करती थी। कभी जीवन भर एक दूसरे का साथ निभाने की कशमें खाई थी। पर दोनो अलग हुए क्यों? क्या इसके लिए अरमान का व्यवहार जिम्मेदार था? हो सकता है। नंदनी आधुनिक ख्यालों में रची बसी थी। पर अरमान परम्परागत विचारों को आदर्श मानता था। उन्हें  न तो नंदनी का पहनावा पसंद था और न  ही वह नंदनी के उन विचारों को प्रशय देता था जो नंदनी अक्सर अरमान पर थोपना चाहती थी। शायद इन्ही विरोधाभासी विचारों ने दोनों के रिश्तों में कटुता पैदा कर दी थी। नंदनी ने उन बाहों में शरण ले ली जो उन्हें वो सारी सारी चीजे करने की  छूट देता हो। और अरमान? उन्हेंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। वो नंदनी को दूर होते हुए देख सकता था पर अपने मूल्यों को नहीं। एक दिन उन्होंने नंदनी को मिलने के लिए बुलाया। और क्या कहा?
"आप जो कर रहे हैं वो सरासर गलत है। पर मैं भी घोर आशावादी प्रवृति का  हूं। आपके  इस व्यवहार में भी मुझे संभावनाओं की जमीन दिखाई दे रही है। यह बात आप भी जानते है कि आपका  व्यवहार मुझे कतई अच्छा नहीं लगेगा। पता नहीं इसके पीछे आपका  मंतव्य क्या है। पर आप ऐसा कर के जाने-अनजाने मेरी जिंदगी पर बड़ा उपकार कर रहे हैं। क्योंकि जब भी मैं आपको किसी दूसरे लड़के के  साथ देखता हूं तो मेरे अन्दर एक अदृश्य शक्ति का  संचार हो जाता है। जीवन में कुछ बनने का जज्बा पैदा हो जाता है। जिंदगी से लडऩे का हौसला मिलता है। मुझे नजरअंदाज करने वाला आपका हर एक कदम मुझे गंभीर जीवन के और समीप ले आता है। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप मेरे साथ एसा व्यवहार जारी रखे। क्योंकि यही मुझे हौसला देती है। हालात से लडऩे के लिए प्रेरित करती है। तो नंदनी जी और जलाईए मुझे। जितना जला सकते है उतना जलाईए। मेरे दिशाहीन जिंदगी को इस जलन की जरूरत है। आपके जलन के इस चलन को मेरा नमन।"

12.7.11

11.7.11


पाश्चात्य संस्कृति को हम क्यूं  इतना स्वीकर करें  
छोड़ के अपना घर आंगन गैरों के घर से प्यार करें


आठ इंच की  हील कहीं, कहीं कमर से नीचे पैंट है
खान-पान में पिट्जा बर्गर फिल्मों में जेम्स बांड है
हिंदी भी अब रोने लगी है देख के आज युवाओं को
बात-चीत की शैली में जो अमरिकन एक्सेंट है
 
जरूरी है क्या इन चीजों को खुद से अंगीकार करें
पाश्चात्य संस्कृति को हम क्यूं इतना स्वीकार करें

हेड फोन कानों में लगा है जुबां पे इसके गाली है
बाल हैं लंबे, हेयर बेल्ट और कान में इसके बाली है
देख के कैसे पता चले यह लड़का है या लड़की है
चाल चलन भी अजब गजब है चाल भी इसकी निराली है

कहता है कानून हमारा लड़कों से भी प्यार करें
पाश्चात्य संस्कृति को हम क्यूं इतना स्वीकार करें 

सरवार दुपट्टा बीत गया अब जींस टॉप की बारी है 
वस्त्र पहनकर पुरुषों का यह दिखती कलयुगी नारी है
सोचो आज की लड़की क्या घर आंगन के काबिल है
रोज-रोज ब्यॉ फ्रेंड बदलना फैशन में अब शामिल है

आधुनिकता को ढाल बनाकर इश्क का क्यूं व्यपार करें
पाश्चात्य संस्कृति को हम क्यूं इतना स्वीकार करें


जींस कहीं आगे से फटी पीछे से फटी यह डिस्कोथेक जेनरेशन है
भूल के अपनी भारत मां को  पश्चिम में करते पलायन है
होंठ लाल नाखुन भी बड़े यह दिखती बिल्कुल डायन है
गांधी जयंती याद नहीं पर याद इन्हें वेलेनटायन है
 
भारत की गौरव का कब तक यूं ही हम तिरस्कार करें
पाश्चात्य संस्कृति को हम क्यूं इतना स्वीकार करें


मेक-अप से सजा है चेहरा इनका बिन मेकअप सब खाली है
बच के  रहना तुम इनसे यह माल मिलावट वाली है
दर्पण पर एहसान करे श्रृंगार करे यह घंटों में
रंग बदलती गिरगिट की तरह है दिल बदले यह मिनटों में
 
इनसे हासिल होगा नहीं कुछ चाहे हम सौ बार करें
पाश्चात्य संस्कृति को हम क्यूं इतना स्वीकार करें

9.7.11

अज्ञात नामक  एक गांव था। इस गांव के विषय में असामान्य यह था कि यहां सभी अनपढ़ लोग रहते थे। सिर्फ चतुर्वेदी जी को छोड़ कर। ऐसा नहीं था कि चतुर्वेदी जी बहुत बड़े विद्वान थे। चूंकि वह गांव के बाकी लोगों से ज्यादा पढ़े लिखे थे, यहां वहां भ्रमण करते रहते थे, इसलिए लोगों की नजर में किसी विद्वान से कम नहीं थे। चतुर्वेदी जी की एक अच्छी आदत थी। जब भी वह कहीं कोई नई चीज देखते, उसे अपनी डायरी में नोट में कर लेते। पर उनकी एक बुरी आदत भी थी। वह नई चीजों का नाम तो लिखते थे पर उसका विवरण नहीं लिखते थे। एक बार वह एक मेला घूमने गए। वहां उसे एक भीमकाय जानवर दिखा। लोगों  से उसने पूछा कि यह क्या है? जवाब आया कि यह हाथी है। अपनी आदत के अनुसार चतुर्वेदी जी ने अपने डायरी में लिख लिया-हाथी। थोड़ी देर घूमने के बाद उसे एक गोलाकार वस्तु दिखाई दी। लोगों से पूछने पर उन्हें पता चला  कि यह जामुन है। चतुर्वेदी जी ने अपनी डायरी मे लिख लिया- जामुन। चतुर्वेदी जी ने ना ही हाथी का विवरण लिखा और न ही जामुन का। हां उन्होंने दोनों के आगे काला शब्द जरूर लिखा था।
इत्तेफाक से कुछ दिनों बाद गांव में एक हाथी आया। गांव वालों के लिए यह एक कौतुहल का विषय बन गया क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि यह जानवर है क्या। लोगों ने सोच कि क्यों न चतुर्वेदी जी के पास चलते है। वह पढ़े लिखे हैं। जगह-जगह घूमते रहते हैं। उन्हें जरूर पता होगा इस जानवर के बारे में। लोगों के बुलावे पर चतुर्वेदी जी हाथी के पास पहुंचे। हाथी को देखने के बाद फौरन उसे याद आया कि इसे पहले कहीं देखा है। तत्काल उन्होंने अपनी डायरी निकाली। डायरी में दो चीजें लिखी थी- हाथी और जामुन। अब चतुर्वेदी जी दुविधा में पड़ गए कि यह हाथी है या जामुन? क्योंकि किसी का विवरण तो उन्होंने लिखा था नहीं। पूरे गांव की भीड़ एकत्र थी और चतुर्वेदी जी को उस जानवर के बारे में बताना था। काफी विचार-विमर्श करन के बाद भी चतुर्वेदी जी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए कि यह हाथी है या जामुन। अंतत: उन्होंने गांव वालों को संबोधित करते हुए कहा- "देखिए विद्वानों में बहुत मतभेद है। कोई  इसे हाथी कहता है और कोई इसे जामुन।"
(यह कहानी मैंने कहीं सुनी थी)

3.7.11

सेफिया मुझे माही कह कर पुकारती थी। दरअसल यह नाम मेरी मां का दिया हुआ था। कभी-कभी मुझे भी बड़ा अजीब लगता था। कैसा लड़कियों वाला नाम है यह? और एक बार वैभव ने तो कह भी दिया था कि पंजाबी लड़कियों में माही नाम बेहद प्रचलित है। पर सेफिया को माही नाम बेहद पसंद था। वह हमेशा मुझे इसी नाम से संबोधित करती थी। बाकी दोस्त मेरे माही नाम पर चुटकियां लेने लगते थे, पर सेफिया के संबोधन में आत्मीयता का भाव होता था। वह सम्मानपूर्वक, अधिकारपूर्वक और बेहद गर्व के साथ मुझे इस नाम से संबोधित करती थी। अकेले में तो ठीक था पर जब सेफिया सार्वजनिक स्थलों पर मुझे इस नाम से पुकारती थी तो अटपटा सा लगता था। कभी-कभी मुझे इस बात का एहसास होत था कि मैंने उसे यह बताकर गलती कर दी कि मेरी मां मुझे माही नाम से पुकारती है।
सैफिया के माही संबोधन ने ही उन्हें मेरे समस्त दोस्तों में खास बना दिया था। माही शब्द एक बार कान के पर्दे से टकराकर गूंजने लग जाती थी। खैर एक न एक दिन तो इस गूंज को शांत होना ही था। और शांत  हुआ भी। दो चार दस दिन के लिए नहीं पूरे चार साल के लिए।  मां से बात हो जाती तो यह शब्द सुनने को मिल जाता। वर्ना तो कहीं नहीं। इन चार सालों में माही शब्द कान के पर्दे से टकरायी भले ही हो, पर गूंजी नहीं। समय और परिस्थितियों की पुनरावृत्ति अवश्य होती है। और यह हुआ भी। अब नंदनी मुझे माही कह कर पुकारने लगी। पर नंदनी को माही शब्द के बारे में पता कैसे चला? वैसे ही जैसे सेफिया को पता चला था। नंदनी के संबोधन से मुझे परेशानी तो नहीं थी, पर यह शब्द सुनकर मैं चार साल पीछे चला जाता था। सेफिया का माही और भी गूंजने लगा था। बिल्कुल ध्वनि तरंगों की तरह। पर हुआ वही़...........................ज़ैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि समय और परिस्थितियां स्वंय को दोहराती है। नंदनी का माही भी ज्यादा दिनों तक नहीं चला और एक साल के अंदर ही दम तोड़ गया।
अगर समय और परिस्थिति ने किसी को नहीं बदला तो वो है मेरी मां। सेफिया और नंदनी का संबोधन भले ही बदल गया हो, पर मां का संबोधन आज तक नहीं बदला। नंदनी और सेफिया की तरह और भी आएंगी। पर शायद ही किसी का माही संबोधन मेरी मां की तरह दीर्घकालिक हो।